Sunday, June 27, 2010

एक और सिपाही

ये जो दिन के अँधेरे हैं 
कुछ काले मटमैले से सवेरे हैं 
उन काली स्लेटो में 
उजली लकीरे खीचना चाहता हूँ 
मैं इस देश का एक और सिपाही हूँ 
कुछ सूखे से कमजोर खड़े से पेड़ो को 
अपने रक्त से सीचना चाहता हूँ ||
बेतहास भागती टेढ़ी मेढ़ी सी 
बेअंजाम गलियों को काट कर 
कुछ पक्के नए से, सीधे रौशनी से भरे 
राहों को पाटना ही मेरा संकल्प हैं 
छोड़ दिया हैं मैंने अपने अपनों को 
अब इस देश के  सिवा, नहीं मेरा कोई बिकल्प है||
 Picture used from http://noelrt.com/wp-content/uploads/2009/01/soldier-silhouette.gif

1 comment:

  1. बहुत शानदार अभिव्यक्ति..बधाई.

    ReplyDelete

कुछ कहिये

Random thoughts ...

Random thoughts ... क्यू गुमसुम सी रहती हो , हवाओं की तरह , लहराओ न कभी । उङ जाती हो पलक क्षपकते ही , साथ आओ न कभी ।। कुछ लम्हों की...