Friday, July 26, 2013

बादल , बूँदे और ज़मी

इठला   कर   बादल , जो बैठा था
अपनी गोद में कुछ ठंडे , मोती ले कर
मंडरा रहा था ज़मी पे
जैसे की चिड़ा रहा हों   उसे ….
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देखती रही ज़मी , मुस्कुराते हुए
इतराने दिया की
खुश हो लेने दो , बूंदों को आवारा आंचल में
कब तक साथ  रहेंगे दोनों ….
जब बोझ बढ जाएगा तो दमन  से
बिखर के  गिरना तो, उसकी किस्मत में है
आवारा बदलो पे भरोसा किया हैं
दगा  उल्फ़त में देना, जिसकी फितरत में हैं ….
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समाती गयी अपने  सीने में ज़मीं, बिना सिकवा
जब फेक दिया बादल ने बूँदों के ,बोझ कह के
हर कतरे को सहारा दिया खुद को खो के
और बह गयी उसके साथ, एक नए सफ़र पे
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की  मोहब्बत अक्सर मूक होती हैं
बोलती नहीं , बस सुनना चाहती हैं
वक़्त की चक्की से, पिसती भी नहीं वो
ना ही दूरियों से डर के, सिकुड़ जाती हैं
ज़मी की तरह होती हैं, बस  बाहें खोले
इंतजार करती हैं ,
हाँ ,  वो बूंदों से सच्चा प्यार करती हैं …………….
हाँ, वो बूँदों से सच्चा प्यार करती हैं …………।


Thursday, April 18, 2013

सुकून ...


Sukun on my voice on youtube:

http://youtu.be/TZSV1CnoRkY


रात की मिट्टी को
उठा कर 
हाथ से रगड़ रहा था , की शायद 
उनकी तन्हाई की आदत 
हमे भी लग जाये । 

पर बेवफा वो,  शहर की मिटटी 
उनको अकेले रहने की आदत नहीं थी 
रात भर दौड़ते अंधेरो के साथ 
उनको भी भीड़ की चाहत जो लग गयी थी 

मैं क्या करता , उठा वहाँ से 
चल पड़ा कही और, सुकून की तलाश में 
रास्तो के सीने में बने "divider"
उसपे खड़े स्तम्भ पे 
लाल  , पिली बातिया 
वेबजह ही रंग बदल रही थी 
शायद , उन्हें भी शहर की आदत जो लग गयी थी ॥ 

वही रास्तो के किनारों पे 
कुछ लाश जैसे दिखते शरीर 
चैन से सो रहे थे 
दो चार गुजरती गाडियों में 
उधर ही 
कुछ रात के मुसाफिर 
बेचैन दिख रहे थे ॥ 

मैं भी वही पास 
बैठ कर, सोचा की यही लेट जाऊ 
उनकी फटी कम्बल से उधार ले कर  
मुझे भी कुछ नीद हासिल हो जाए 
पर आँख बंद करते ही रूह  काँपी 
की कही ये रात के मुसफ़िर 
फिर खफा न हो जाएँ ,
और उनकी गाडी के नीचे मेरा सुकून न आ गए 

मैं चल पड़ा फिर कोई और जगह की तलाश में 
की सुकून शायद आज मुझे हासिल न था 
ये शहर हँस रहा था मुझपे 
जैसे की मैं उसके काबिल न था ॥ 

Random thoughts ...

Random thoughts ... क्यू गुमसुम सी रहती हो , हवाओं की तरह , लहराओ न कभी । उङ जाती हो पलक क्षपकते ही , साथ आओ न कभी ।। कुछ लम्हों की...