Friday, July 26, 2013

बादल , बूँदे और ज़मी

इठला   कर   बादल , जो बैठा था
अपनी गोद में कुछ ठंडे , मोती ले कर
मंडरा रहा था ज़मी पे
जैसे की चिड़ा रहा हों   उसे ….
………………………………
देखती रही ज़मी , मुस्कुराते हुए
इतराने दिया की
खुश हो लेने दो , बूंदों को आवारा आंचल में
कब तक साथ  रहेंगे दोनों ….
जब बोझ बढ जाएगा तो दमन  से
बिखर के  गिरना तो, उसकी किस्मत में है
आवारा बदलो पे भरोसा किया हैं
दगा  उल्फ़त में देना, जिसकी फितरत में हैं ….
..................................................
समाती गयी अपने  सीने में ज़मीं, बिना सिकवा
जब फेक दिया बादल ने बूँदों के ,बोझ कह के
हर कतरे को सहारा दिया खुद को खो के
और बह गयी उसके साथ, एक नए सफ़र पे
..................................................
की  मोहब्बत अक्सर मूक होती हैं
बोलती नहीं , बस सुनना चाहती हैं
वक़्त की चक्की से, पिसती भी नहीं वो
ना ही दूरियों से डर के, सिकुड़ जाती हैं
ज़मी की तरह होती हैं, बस  बाहें खोले
इंतजार करती हैं ,
हाँ ,  वो बूंदों से सच्चा प्यार करती हैं …………….
हाँ, वो बूँदों से सच्चा प्यार करती हैं …………।


5 comments:

  1. अद्भुत होती हैं आपकी उपमाएं। अद्भुत कविता है... अंतिम पंक्तियां बहुत ही लाजवाब

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  2. मोहब्बत अक्सर मूक होती हैं
    बोलती नहीं , बस सुनना चाहती हैं
    वक़्त की चक्की से, पिसती भी नहीं वो
    ना ही दूरियों से डर के, सिकुड़ जाती हैं
    ज़मीं की तरह होती है, बस बाहें खोले
    इंतजार करती है...


    सुंदर कविता है आदरणीय राहुल जी

    आपकी लेखनी से निरंतर श्रेष्ठ सृजन होता रहे...
    हार्दिक मंगलकामनाओं सहित...

    ♥ रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं ! ♥
    -राजेन्द्र स्वर्णकार


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