Thursday, September 15, 2011

शुक्रिया हिंदी ||

नहीं कह पाता गैरो की जुबा में

अपनी कहानी |

मेरे आँखों को अच्छी लगती है

सिर्फ अपनी भाषा में लिखी

अपनी जुबानी ||
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प्यार के संवाद तो, दिल से निकलते हैं

उनका अंगेरजी अनुवाद कैसे बनाऊ

मेरा दिल तो हिंदी है

उसपर अंगेरजी की परत कैसे लगाऊ ||
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दिल की परतो को

जब भी शब्दकार की छुरी से कटा

वो निकली आह , हिंदी ही थी |

लगाया था मरहम जिसने

खुद को खर्च करके

वो हमदर्द, वो दिन भी

हिंदी ही थी ||
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न जाने कितनो ने दफनाना चाहा

समय की मिटटी में तुम्हे , मुर्दा कह के |

तुम फिर भी रही जिंदा

दिलो में हमारे , हमारी जुवा बन के ||
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आज हिंदी दिवस पे

हर कबि का, तुम्हारे लिए पैगाम है |

तुम्हारे संघर्ष को

हम सभी का , सलाम है ||
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Thursday, September 08, 2011

बेबस नहीं रहना है ||

क्या आँशु बहाने के सिवा
कुछ और करना, नहीं है
सिर्फ धमाको से ही
मरना सही है ||

जब तक डरते रहोगे, डर से
ये खोखले टोपीवाज 
डराते रहेंगे |
आतंक के खिलाफ जंग जारी है
कह कह  के
हर लाश पे वो, मुस्कुराते रहेंगे ||

मन में दबाये बैठे हम
इस गुस्से से क्या कर पाएंगे |
फटेगा तो अन्दर ही फटेगा
उस नहीं तो, इस धमाके से
बेमौत मारे ही जायेंगे ||


डरते नहीं हैं ये टोपीवाज़, आतंक से
अपना कोई आज तक, मरा ही नहीं
कभी उठाई नहीं लाशे, अपने बच्चो की
इसलिए शायद , आँखों का तालाब
कभी भरा ही नहीं ||

कोई नहीं जलाएगा मशाल अपने लिए
हमारे मन का अँधेरा है
खुद ही जलाना होगा |
छोड़ दे विश्वास  , इन टोपिवाजो से 
शायद ,
अब आतंक से लड़ने
हमे , खुद ही को आगे आना होगा ||


जय हिंद !!

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