Thursday, September 15, 2011

शुक्रिया हिंदी ||

नहीं कह पाता गैरो की जुबा में

अपनी कहानी |

मेरे आँखों को अच्छी लगती है

सिर्फ अपनी भाषा में लिखी

अपनी जुबानी ||
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प्यार के संवाद तो, दिल से निकलते हैं

उनका अंगेरजी अनुवाद कैसे बनाऊ

मेरा दिल तो हिंदी है

उसपर अंगेरजी की परत कैसे लगाऊ ||
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दिल की परतो को

जब भी शब्दकार की छुरी से कटा

वो निकली आह , हिंदी ही थी |

लगाया था मरहम जिसने

खुद को खर्च करके

वो हमदर्द, वो दिन भी

हिंदी ही थी ||
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न जाने कितनो ने दफनाना चाहा

समय की मिटटी में तुम्हे , मुर्दा कह के |

तुम फिर भी रही जिंदा

दिलो में हमारे , हमारी जुवा बन के ||
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आज हिंदी दिवस पे

हर कबि का, तुम्हारे लिए पैगाम है |

तुम्हारे संघर्ष को

हम सभी का , सलाम है ||
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6 comments:

  1. राहुल के तबेले में माल अच्छा है।

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  2. हिंदी राष्ट्र की बिंदी|

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  3. भारतवर्ष की पहचान है हिंदी |

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  4. हिंदी भाषा का गौरव -गान करती हुई सुन्दर रचना .........

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  5. हिन्दी पर बहुत सुंदर लगी ये कविता ...बधाई एवं शुभकामनाएँ ।

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कुछ कहिये

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