Thursday, September 08, 2011

बेबस नहीं रहना है ||

क्या आँशु बहाने के सिवा
कुछ और करना, नहीं है
सिर्फ धमाको से ही
मरना सही है ||

जब तक डरते रहोगे, डर से
ये खोखले टोपीवाज 
डराते रहेंगे |
आतंक के खिलाफ जंग जारी है
कह कह  के
हर लाश पे वो, मुस्कुराते रहेंगे ||

मन में दबाये बैठे हम
इस गुस्से से क्या कर पाएंगे |
फटेगा तो अन्दर ही फटेगा
उस नहीं तो, इस धमाके से
बेमौत मारे ही जायेंगे ||


डरते नहीं हैं ये टोपीवाज़, आतंक से
अपना कोई आज तक, मरा ही नहीं
कभी उठाई नहीं लाशे, अपने बच्चो की
इसलिए शायद , आँखों का तालाब
कभी भरा ही नहीं ||

कोई नहीं जलाएगा मशाल अपने लिए
हमारे मन का अँधेरा है
खुद ही जलाना होगा |
छोड़ दे विश्वास  , इन टोपिवाजो से 
शायद ,
अब आतंक से लड़ने
हमे , खुद ही को आगे आना होगा ||


जय हिंद !!

5 comments:

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  2. उम्मीद से परिपूर्ण इस रचना के लिए बधाई।

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  3. आपका स्वागत है राहुल जी
    आपकी कविता हमेशा चकित करती है....

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  4. "कभी उठाई नहीं लाशे, अपने बच्चो की
    इसलिए शायद, आँखों का तालाब
    कभी भरा ही नहीं ||

    अद्भुत बिम्ब - प्रशंसनीय रचना - बधाई

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