Sunday, May 16, 2010

रक्त

कुछ लाल सा हैं
कब से, उबल रहा
मचल रहा ......
तोड़ने को हर हदे
दिल की हर सरहदे
चल रहा
कुछ लाल सा हैं ...उबल रहा
....
कोई साथ दे अगर
एक हाथ दे अगर
कोई तो दिशा दिखा
कोई रास्ता बता
कुछ लाल सा ....उबल रहा ...
....
ठाहरा नहीं , कही
जब से मिली  ज़मी
बहता ही रहा
कितने दिए सितम
लेकिन हर जनम
सहता ही रहा
कुछ लाल सा  है.....उबल रहा
..
कोई आग तो जलाये
कुछ लकडिया तो लाये
चुपचाप कब से बैठा
कही ठंडा हो ना जाए
कुछ लाल सा है ये ...कब से उबल रहा
......
पंदंदिया बना के
नलयो में बांध डाला
कुछ कर ना जाए ये
कबसे मचल रहा
कुछ लाल सा है ...कब से मचल रहा
....

1 comment:

  1. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन

    Sanjay kumar
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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