किसी के संग के बिना
कितनी अधूरी सी लगती है
ये ज़िन्दगी कभी एक मृग
कस्तूरी सी लगती है
:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(
थामे खुद का हाथ
करते खुद से बात
भागते एक शहर
से दुसरे शहर
ये कितनी
गैरज़रूरी सी लगती है
ये ज़िन्दगी कभी एक मृग
कस्तूरी सी लगती है
:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(
ऊपर और ऊपर
उससे , सबसे
जाने किस किस से
इसी फ़िक्र में
ये कितनी जिहजुरी
सी लगती है
ये ज़िन्दगी कभी एक मृग
कस्तूरी सी लगती है
:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(
शब्दों की गहराई अचूक है !! जब साथ हो जाती है तो नयी दुनिया बना लेती है !! मैं इन्ही शब्दों का शब्दकार हु , शब्दों से खेलना मेरी आदत , शब्दों में जीना मेरी हसरत !! जुडये मेरे साथ , कुछ सुनिए कुछ सुनाइए , एक दुसरे का हौसला बढाइये||
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'ये जिन्दगी कभी एक
ReplyDeleteमृग कस्तूरी सी लगती है '
कितनी लाजवाब पंक्ति है .....पूरी रचना अच्छी लगी |
... bahut khoob !!
ReplyDeleteसोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !
ReplyDeleteआपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना लिखी है राहुल जी - हार्दिक बधाई
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