Wednesday, November 28, 2012

याद नहीं कब..

याद नहीं कब

बस्ते से निकाल के

दिल को हवा में उछाला था ,

तन्हा दीवारों को खुरच कर

किसी का नाम उसके सीने पे

दाग डाला था ।।


चिलमिलाती धुप से

नज़रे मिलाने को बेताब थी आँखे

सूरज के आँखों में आँख डाल कर

उसकी रौशनी  चुराने को

बेक़रार थी आँखे ।।


कुरते के बाहों को समेट कर

उसमे ज़माने को दबाना चाहते थे

दिल की आवाज को पानी में घोल

लहू में मिलाना चाहते थे ।।


वो पन्ने समय के कदमो में उलझ

किसी की कुर्बानी हो गए

और वो फ़साने आँखों के समुन्दर में

डूब, पानी पानी हो गए ।।


लगता है कोयले से उधर ले के कालिख

किसी ने मेरे सपनो को , कर दिया काला था

अब याद नहीं कब, बस्ते से निकाल के

दिल को..... हवा में उछाला था ।।

5 comments:

  1. उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...
    कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ

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  2. निर्लिप्त भाव से रची गई सुन्दर रचना!

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  3. कमोबेश सभी के साथ होता है यह...इसलिए किताबों के समय में यानि पढ़ते वक्त दिल को संभालना बहुत जरूरी है...सम्पर्क कीजिए...

    veena.rajshiv@gmail.com

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  4. "याद नहीं कब
    बस्ते से निकाल के
    दिल को हवा में उछाला था ,
    तन्हा दीवारों को खुरच कर
    किसी का नाम उसके सीने पे
    दाग डाला था।।"

    वाह - अति सुंदर

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  5. bahut khoob....
    अब याद नहीं कब, बस्ते से निकाल के
    दिल को..... हवा में उछाला था ।।
    http://ehsaasmere.blogspot.in/

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