Thursday, July 22, 2010

बातें कम हैं

लफ्ज कहाँ  मिलते हैं
हमें कोई बता दे ज़रा
हमे भी दो चार आने के
बातें खरीदनी है ||
की अक्सर प्यार बताना
मुस्किल पड़ता है मुझको
कभी राते तो कभी बातें
कम पड़  जाती हैं ||
ये मन सोचता है कुछ कहने को
पर पेट के अंदर तितलिया उडती हैं
होटो से आती नहीं बाते बाहर
दिल की बाते दिल में ही रहती हैं||
आती है वो , आकर चली जाती हैं  
हम लफ्जो को गिनते रह जाते हैं
जान  नहीं पते खुद के मन को 
उनके चहरे को पदते रह जाते हैं |

5 comments:

  1. बहुत रोचक और सुन्दर अंदाज में लिखी गई रचना .....आभार

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

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  3. Maaf kijiyga kai dino bahar hone ke kaaran blog par nahi aa skaa

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  4. DHANYAWAAD RAHUL BHAI BLOG PAR ANE AUR AUR MERA HOSLA BADHANE KE LIYE
    UMEED HAI AGE BHI MERA HOSLA BADHAYEGE

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कुछ कहिये

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