किसी के संग के बिना
कितनी अधूरी सी लगती है
ये ज़िन्दगी कभी एक मृग
कस्तूरी सी लगती है
:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(
थामे खुद का हाथ
करते खुद से बात
भागते एक शहर
से दुसरे शहर
ये कितनी
गैरज़रूरी सी लगती है
ये ज़िन्दगी कभी एक मृग
कस्तूरी सी लगती है
:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(
ऊपर और ऊपर
उससे , सबसे
जाने किस किस से
इसी फ़िक्र में
ये कितनी जिहजुरी
सी लगती है
ये ज़िन्दगी कभी एक मृग
कस्तूरी सी लगती है
:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(:-(
शब्दों की गहराई अचूक है !! जब साथ हो जाती है तो नयी दुनिया बना लेती है !! मैं इन्ही शब्दों का शब्दकार हु , शब्दों से खेलना मेरी आदत , शब्दों में जीना मेरी हसरत !! जुडये मेरे साथ , कुछ सुनिए कुछ सुनाइए , एक दुसरे का हौसला बढाइये||
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आज़ाद
नहीं नापता मैं खुद को तेरे पैमाने से .. मेरी तासीर मेल न खायेगी इस ज़माने से ।। अपनी जेब में रख तेरे कायदे कानून .. मैं नहीं टूटने वाला ते...
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किसी के इश्क की इम्तिहा न ले कोई किसी के सब्र की इंतिहा न हो जाए प्यार मर न जाए प्यासा यु ही और आंशुओ के सैलाब में ज़िन्दगी न बह जाये … ...
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नहीं नापता मैं खुद को तेरे पैमाने से .. मेरी तासीर मेल न खायेगी इस ज़माने से ।। अपनी जेब में रख तेरे कायदे कानून .. मैं नहीं टूटने वाला ते...
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मंजिलो में चलते चलते कुछ राह बदल जातें हैं शुरुआत कहाँ होती है ये ख्तम कहीं होते है .... अक्सर राहो में चलते चलते हमराह बदल जातें है एक मोड़...
'ये जिन्दगी कभी एक
ReplyDeleteमृग कस्तूरी सी लगती है '
कितनी लाजवाब पंक्ति है .....पूरी रचना अच्छी लगी |
... bahut khoob !!
ReplyDeleteसोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !
ReplyDeleteआपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना लिखी है राहुल जी - हार्दिक बधाई
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