कुछ सीलन सी है
मेरे घर के दीवारों में
बारिस की कुछ बुँदे
मेरे घर रहने आ गयी है
________________
लगता है इनका मन
ज़मी पे लगता नहीं
की हरयाली शायद
ज़मी को छोड़ के
आजकल इमारतो के
छज्जो में समां गयी है
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ठंडी हवाए बहती नहीं रास्तो पे
पंख खोलने को जगह नहीं है
मकानों के अन्दर ही बसेरा है इनका
बंद रहना आजकल सजा नहीं है
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शब्दों की गहराई अचूक है !! जब साथ हो जाती है तो नयी दुनिया बना लेती है !! मैं इन्ही शब्दों का शब्दकार हु , शब्दों से खेलना मेरी आदत , शब्दों में जीना मेरी हसरत !! जुडये मेरे साथ , कुछ सुनिए कुछ सुनाइए , एक दुसरे का हौसला बढाइये||
Sunday, August 29, 2010
Thursday, August 19, 2010
All is Well!!!
सब देखते हैं अंधेरे को
इस अंधेरो में रौशनी कोई क्यों देखता नहीं
हथियार खून रक्त की चर्चा हर जगह है
पाल रहें पेड़ो की माली को कोई पूछता नहीं ||
भ्रष्ट नेताओ की बात सब कोई करते हैं
रोज लड़ रहें समाजवादियो को कोई सोचता नहीं
मिल रही है हर बेकारो को जगह हर अखबारों में
अन्ना हजारे , उनिकृष्णन को कोई पूछता नहीं ||
आज भी इमानदारी कायम है
नहीं बिश्वास तो इन पक्तियों को पढने वाले दिल से पूछ लो
जो ना होती सच्चाई आज भी दिल में
तो कब के अँधेरे खा जाते हर सुबह को ||
इस अंधेरो में रौशनी कोई क्यों देखता नहीं
हथियार खून रक्त की चर्चा हर जगह है
पाल रहें पेड़ो की माली को कोई पूछता नहीं ||
भ्रष्ट नेताओ की बात सब कोई करते हैं
रोज लड़ रहें समाजवादियो को कोई सोचता नहीं
मिल रही है हर बेकारो को जगह हर अखबारों में
अन्ना हजारे , उनिकृष्णन को कोई पूछता नहीं ||
आज भी इमानदारी कायम है
नहीं बिश्वास तो इन पक्तियों को पढने वाले दिल से पूछ लो
जो ना होती सच्चाई आज भी दिल में
तो कब के अँधेरे खा जाते हर सुबह को ||
Monday, August 02, 2010
Thursday, July 22, 2010
बातें कम हैं
लफ्ज कहाँ मिलते हैं
हमें कोई बता दे ज़रा
हमे भी दो चार आने के
बातें खरीदनी है ||
की अक्सर प्यार बताना
मुस्किल पड़ता है मुझको
कभी राते तो कभी बातें
कम पड़ जाती हैं ||
ये मन सोचता है कुछ कहने को
पर पेट के अंदर तितलिया उडती हैं
होटो से आती नहीं बाते बाहर
दिल की बाते दिल में ही रहती हैं||
आती है वो , आकर चली जाती हैं
हम लफ्जो को गिनते रह जाते हैं
जान नहीं पते खुद के मन को
उनके चहरे को पदते रह जाते हैं |
हमें कोई बता दे ज़रा
हमे भी दो चार आने के
बातें खरीदनी है ||
की अक्सर प्यार बताना
मुस्किल पड़ता है मुझको
कभी राते तो कभी बातें
कम पड़ जाती हैं ||
ये मन सोचता है कुछ कहने को
पर पेट के अंदर तितलिया उडती हैं
होटो से आती नहीं बाते बाहर
दिल की बाते दिल में ही रहती हैं||
आती है वो , आकर चली जाती हैं
हम लफ्जो को गिनते रह जाते हैं
जान नहीं पते खुद के मन को
उनके चहरे को पदते रह जाते हैं |
Sunday, July 18, 2010
Ye kaIsi pYas hAi
(Refers to yEt aGain , oNe mOre tRain acciDent on 19th जुलाई 2010)
फिर से हुआ है खून
शांत से बैठे
मूक बधिर हम जैसे परिंदों का
आज फिर लहूलुहान ट्रेनों ने
रक्त स्नान किया है
…
ये कैसी प्यास है
बेजान ट्रेनों का
जिसने हर दुसरे दिन
बेबस हम जैसे परिंदों का
रक्त पान किया हैं
....
क्यों बुझती नहीं प्यास इसकी
क्यों , कोई इसकी तृष्णा मिटाता नहीं
फिर ना धोये खून से ये हाथ अपने
कोई क्यों ऐसा , दिन आता नहीं
फिर से हुआ है खून
शांत से बैठे
मूक बधिर हम जैसे परिंदों का
आज फिर लहूलुहान ट्रेनों ने
रक्त स्नान किया है
…
ये कैसी प्यास है
बेजान ट्रेनों का
जिसने हर दुसरे दिन
बेबस हम जैसे परिंदों का
रक्त पान किया हैं
....
क्यों बुझती नहीं प्यास इसकी
क्यों , कोई इसकी तृष्णा मिटाता नहीं
फिर ना धोये खून से ये हाथ अपने
कोई क्यों ऐसा , दिन आता नहीं
Sunday, June 27, 2010
Story of an IT Professional!!!
मैं देखती हूँ दुनिया को
अपने कंप्यूटर के अंदर के windows से |
की अपने इस इमारत में
बाहर देखने के लिए खिड़किया नहीं ||
मिलती हूँ अपने परिवार और दोस्तों से
फेसबुक , ऑरकुट और लिंक्ड इन पे |
की मेरी ब्यस्त ज़िन्दगी में
घर जाने आने का वक़्त नहीं ||
बनती रहती हूँ लॉजिक सारी दुनिया के लिए
अपनी ज़िन्दगी कभी ऑन टाइम चलती नहीं |
पंक्चुअल हूँ अपने हर क्लाएंट मीटिंग में
पर समय पर घर कभी, पहुचती नहीं ||
बखूवी manage करती हूँ बड़ी टीम को
पर घर का मैनेजमेंट बिगड़ सा गया हैं|
Project तो टाइम में चल रहा है
पर घर का मौसम उजड़ सा गया है ||
सात समुंदर दूर , हर कोई जानता है मुझे
पर घर का पडोसी पहचानता नहीं |
प्रोजेक्ट पे सब अंडर कण्ट्रोल है
घर पे टिंकू कोई बात मानता नहीं ||
पिछले दिनों घर के लैपटॉप पे
ड्राफ्ट इ मेल मिला था
टिंकू ने God@जीमेल.कॉम पे एक ख़त लिखा था
कहता हैं , मम्मी रोज घर क्यों नहीं आती |
सोनू के मम्मी की तरह , कहानिया क्यों नहीं सुनाती||
पढते पढते मै आसुओ को रोक ना सकी
जब कर ना सकी गिल्ट पे काबू
जब कर ना सकी गिल्ट पे काबू
तो देने God को clarification ,
दो कदम आगे बढ़ी|
पर इन इमारतों से बाहर झाकने के लिए
फिर से,
कोई खिडकिया नहीं खुली ||
एक और सिपाही
ये जो दिन के अँधेरे हैं
कुछ काले मटमैले से सवेरे हैं
उन काली स्लेटो में
उजली लकीरे खीचना चाहता हूँ
मैं इस देश का एक और सिपाही हूँ
कुछ सूखे से कमजोर खड़े से पेड़ो को
अपने रक्त से सीचना चाहता हूँ ||
बेतहास भागती टेढ़ी मेढ़ी सी
बेअंजाम गलियों को काट कर
कुछ पक्के नए से, सीधे रौशनी से भरे
राहों को पाटना ही मेरा संकल्प हैं
छोड़ दिया हैं मैंने अपने अपनों को
अब इस देश के सिवा, नहीं मेरा कोई बिकल्प है||
Picture used from http://noelrt.com/wp-content/uploads/2009/01/soldier-silhouette.gif
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आज़ाद
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